मजाक बहुत उड़ा लिया अब हकीकत भी जान लीजिए करवाचौथ व्रत की

करवाचौथ व्रत को लेकर कई तरह के चुटकुले अक्सर आपको सोशल मीडिया पर मिल रहे होंगे लेकिन हमें संजीव पांडे जी ने यह बहुत अच्छा संदेश भेजा है। जिसे हम आप सब के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। इसमें उन सवालों के जवाब हैं जो करवाचौथ से संबंधित हैं। यह ले किसका है मुझे नहीं पता परंतु संदेश के अंत में एक नाम है जिन्होंने इसे लिखा है आप लोगों को इसे जरूर पढ़ना चाहिए। 

*करवा चौथ विषेश* – *गृहस्थ एक तपोवन व अध्यात्म विज्ञान*

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*मैं करवाचौथ पर व्रत क्यों रखूंगी ?*
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यह दिन शुभ है, और चन्द्रमा के रोहणी नक्षत्र में होने के कारण इस दिन व्रत का आध्यात्मिक महत्त्व कई गुना बढ़ जाता है। प्राचीन समय से अर्थ व्यवस्था(धन कमाने का) का उत्तरदायित्य पुरुष वहन करते थे और धर्म व्यवस्था(पुण्य कमाने का) का उत्तरदायित्य स्त्रियां वहन करती थीं। आज की तरह स्वार्थी लोग न थे, पति पत्नी दो शरीर एक प्राण की तरह एक दूसरे के पूरक थे। मेरा इस भारतीय संस्कृति और धर्म व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास है। इसलिए व्रत रखूंगी। अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति हेतु इस दिन जप तप व्रत करूंगी। पति प्रेम के प्रति आभार व्यक्त करने हेतु व्रत रखूंगी।

*अन्न त्याग क्यों ?*
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भोजन पचाने में प्राणऊर्जा यदि खर्च हुई तो आध्यात्मिक ऊर्जा के संग्रह में बाधा उतपन्न होती है। अन्न को पचाने में 90% प्राण ऊर्जा ख़र्च हो जाती है। अतः क्योंकि इस दिन सर्वाधिक तपशक्ति अर्जन करने की आवश्यकता है, इसलिए मैं अन्न का त्याग करूंगी। पूरा ध्यान जप तप व्रत पर एकाग्र करूंगी।

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*सजना सवरना क्यों ?*

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सोलह श्रृंगार भारतीय परंपरा के सोलह सँस्कार का प्रतीक हैं। समस्त आभूषण मुझे मेरे पति, मेरे परिवार के प्रति मेरे उत्तरदायित्य का भान कराते हैं। मैं इस घर की गृहलक्ष्मी हूँ साथ ही परिवार निर्मात्री का उत्तरदायित्य याद दिलाते है। गृहस्थ जीवन मे प्रवेश के वक्त के वचन याद दिलाते हैं, और उन यादों को ताज़ा करते है कि कैसे इस घर में मेरा गृह प्रवेश हुआ था। यह एक तरह से हम दोनों का आध्यात्मिक विवाह वर्ष गांठ है। हम दोनों को अपने अपने कर्तव्य और प्रेम का परिचय यह व्रत करवाता है। इसलिए आज के दिन मैं दुल्हन की तरह और मेरे पति दूल्हे की तरह सजेंगे। चन्द्र और ग्रह नक्षत्र को साक्षी मानकर पुनः अपने रिश्ते में अमृतमय प्रेम और शीतलता का संचार करेंगे।

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*व्रत की कथा का क्या सन्देश है?*
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तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता।
तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥
तपबल संभु करहिं संघारा।
तपबल सेषु धरइ महिभारा॥2॥

*भावार्थ*:-तप के बल से ही ब्रह्मा संसार को रचते हैं और तप के बल से ही बिष्णु सारे जगत का पालन करते हैं। तपबल से शिव शंकर संघार करते हैं। तपबल से ही शेषनाग धरती का भार अपने ऊपर रखे हुए है।।

तप की शक्ति से किसी भी प्रारब्ध का शमन किया जा सकता है। तपबल से जीवन मे नए प्राण का संचार किया जा सकता है। तपबल से असम्भव भी संभव हो जाता है।

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*मेरे पति को भी व्रत करना चाहिए ?*

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जिस तरह आज के समय मे स्त्री अर्थ व्यवस्था भी सम्हाल रही है। दोनों यदि जॉब कर रहे हैं, तो प्रेम वश पति भी व्रत कर सकते हैं। व्रत उपवास स्वेच्छा से कर सकते हैं। एक समय फलाहार और एक समय भोजन के साथ। जिस प्रकार स्त्री का शरीर पुरुषों से ज्यादा आंतरिक रूप से मजबूत है, इसलिए सन्तान उतपत्ति का महान उत्तरदायित्य पत्नी वहन करती है। लेकिन पत्नी यदि शरीर से गर्भ को धारण करती है तो पुरूष दिमाग़ में गर्भ धारण करता है। दोनों अपनी अपनी क्षमतानुसार पालक की भूमिका निभाते है। किसी की भी भूमिका कम महत्त्वपूर्ण नहीं। यदि पति शरीर से व्रत न रख सके तो कोई बात नहीं। प्रेमपूर्वक जप तप में अभिन्न सहयोगी की भूमिका निभाते ही है।

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*भूख कैसे नियंत्रित करोगी ?*
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स्त्री प्रेम और त्याग की मूर्ति होती है। वो पति और सन्तान के लिए एक दिन तो क्या कई दिन व्रत रख सकती है। प्रेम में वह स्वयं के अस्तित्व को भूल जाती है। वह शरीर से परे चली जाती है और ईश्वरीय शरण में पति के उज्ज्वल भविष्य हेतु प्रार्थना रत रहती है। इसलिए पति के उज्ज्वल भविष्य और दीर्घायु के लिए भूख बर्दास्त करना कोई बड़ी बात नहीं है।

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*चन्द्रमा की प्रतीक्षा क्यों ?*
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चन्द्र दर्शन और अर्घ्य का विशेष महत्त्व है।

👉🏼पति और स्वयं की सद्बुद्धि के लिए पहले गायत्री मंत्र जप किया जाता है।

गायत्री मंत्र – *ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।*

👉🏼 पति के उज्ज्वल भविष्य और दीर्घायु के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप किया जाता है।

महामृत्युंजय मंत्र – *ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्* *उर्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात्*

👉🏼 वैवाहिक जीवन मे प्रेम, सुख शांति और अमृत के लिए चन्द्र गायत्री मंत्र का जप करेंगे, फिर चन्द्र गायत्री मंन्त्र पढ़ते हुए अर्घ्य चांदी के लोटे या स्टील के लोटे या मिट्टी के लोटे जल चढ़ाएंगे:-

चन्द्र गायत्री मंत्र – *ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्त्वाय धीमहि। तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात्।*

दीप दर्शन चंद्रदेव को करवाऊंगी।

*चलनी से चन्द्र और पति को क्यों देखते है?*

प्रत्येक मनुष्य में गुण-अवगुण दोनों होते हैं। चलनी सन्देश देती है कि पति के गुणों पर फोकस करके उन्हें बढ़ाओ और अवगुणों की उपेक्षा करो।

आधी ग्लास खाली और आधी भरी बात तो दोनों सत्य है, जो आधी भरी देखेगा, जो जीवन मे जो मिला है उस पर ध्यान फोकस करेगा सुखी रहेगा।

*जल पिलाने और मीठा खिलाने का क्या प्रयोजन है?*

स्त्री के प्रति प्रेम और अपने उत्तरदायित्य हो वहन करने का संकल्प है, कि आजीवन हम तुम्हें जल जैसा शीतल प्रेम देंगे और मिठाई जैसा तुम्हारा जीवन मधुर रखेंगे। तुम्हारा ख्याल रखेंगे।

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अध्यात्म विज्ञान बहुत गूढ़ है, अतः कुतर्क न करें। यह भावना विज्ञान और शब्द शक्ति विज्ञान पर आधारित विधिव्यवस्था है। ईश्वर कण कण में है, और उस Wifi की तरह है जिसमें श्रद्धा-विश्वास का सही पासवर्ड डालें तो उस परमात्म चेतना से कनेक्ट होना सम्भव है।

अब जिसने कभी कंप्यूटर देखा और सुना नहीं उसे कम्प्यूटर जगत और सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग समझाना असम्भव है, उसे सॉफ्टवेयर कैसे बनता है यह समझाना असम्भव है। अतः जिन्होंने कभी प्रार्थना में भगवान के आगे सर नहीं झुकाया और जो कुतर्की नास्तिक है उन्हें भी अध्यात्म समझाना असम्भव ही है।

तर्क हम उच्च उद्देश्य से अध्यात्म को समझने के लिए और उसे जीवन में धारण करने के लिए करते हैं, कुतर्क हम अध्यात्म के विज्ञान को चूहे जैसा कुतरने के लिए निम्न उद्देश्य से करते हैं।

🙏🏻श्वेता चक्रवर्ती
डिवाइन इंडिया यूथ असोसिएशन

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