
विश्व योग दिवस : “योग रोग का शत्रु है, भोग रोग का मीत। योग साध हर शत्रु से, तन-मन सकता जीत”
अन्तरराष्ट्रीय योग-महोत्सव पर
योग रोग का शत्रु है,भोग रोग का मीत।
योग साध हर शत्रु से, तन-मन सकता जीत।
अखिल विश्व ने योग को, दिया प्रतीक्षित मान।
यही मान अब करेगा, वसुधा का कल्याण।
बुद्धिवाद के दौर में, शुद्धिवाद का तौर।
सृजने हित ही है बना, योग आज सिरमौर।
योगः कर्मसु कौशलम्, योगः धर्मसु ध्येय।
योगःमर्मसु मार्दवम्, जीवन का पाथेय।
चित्तवृत्ति का निग्रहण,प्रणतानन्द-प्रसार।
योग-क्षेम के भाव को, देते रूपाकार।
अजर रखे मन का अजिर, सुदृढ बनाए गात्र।
योग बनाए प्राण को, अक्षत अक्षय-पात्र।
योग साध्य की साधना,साधक की संसिद्धि।
ओज,तेज,बल,आयु को, देता सुखद समृद्धि।
स्वयं ‘मोह-मद’ में फँसे,पाले कामद क्रोध।
वही कर रहे योग का, दुराग्रही प्रतिरोध।।
यम नियमासन, प्राण का, आयामी विस्तार।
सांसारिक भय,शोक का, करता है निस्तार।
प्रत्याहार समाधि सँग, मित्र! धारणा ध्यान।
अष्टांगी इस योग के, अनुदानी वरदान।
समुचित क्रम से यदि मनुज, किए रहे अभ्यास।
जरा-मरण का भय नहीं, झरखे उसके पास।।
रचनाकार-आचार्य देवेंद्र देव


