देववाणी : ओ व्योम वीर ! ओ धरणि वीर ! ओ जलधि वीर! ओ शौर्य-सदन

जय जवान——

ओ व्योम वीर! ओ धरणि वीर!
ओ जलधि वीर! ओ शौर्य-सदन!
तुझको अर्पित सौ-सौ प्रणाम,
तुझको कवि के सौ बार नमन।।

तू धरती पर जन्मा, लेकर
उर में भावों का महाकाश।
कण्ठ में महोदधि का गर्जन,
दृष्टि में दामिनी का प्रकाश।

गुम्फित कर्तव्यों की कामिनि
तेरी चाहों की बाँहों में।
वेदना जन्मभू-जननी की
है तेरे अन्तर्दाहों में।

है रहा तिरंगे की रक्षा-हित
अर्पित तेरा तन-मन-धन।।
ऐ धीर, वीर, हम्मीर! तुझे
इस कवि के सौ-सौ बार नमन।१।

तू लक्ष्मण बनकर संरक्षित
करता सीता-सी सीमाएँ।
झेलता शीत की,गर्मी की,
वर्षा की भीषण बाधाएँ।

तेरे अस्त्रों-शस्त्रों ने रिपु के
दल-बादल संहारे हैं।
आतंकों के सर्जक उसके ही
घर में घुसकर मारे हैं।

उनके शिविरों पर की है
गोली-गोलों की बौछार सघन।
ऐ धीर, वीर, हम्मीर! तुझे
इस कवि के सौ-सौ बार नमन।।२।

पालकी बना बीमारों को
कन्धों पर ढोते देखा है।
पढ़ने वाले बच्चों पर
तुझको प्रीति बिलोते देखा है।

तुझको देखा है नाकिस लोगों
द्वारा अपमानित होते।
पर, कवि ने देखा कभी नहीं
तुझको अपना धीरज खोते।

पीते देखा है कालकूट,
बन महाकाल का सौम्य सुवन।
ऐ धीर, वीर, हम्मीर! तुझे
इस कवि के सौ-सौ बार नमन।३।

जल-प्रलयों में तूने सदैव
जन-जीवन की रक्षा की है।
जन-गण की आशाओं,
विश्वासों के धन की रक्षा की है।

तूने तूफ़ानी लहरों की
सुरसा से बालक छीने हैं।
चट्टानों के आक्रोशों से
शिशुओं के पालक छीने हैं।

साक्षी इसके उन्चास पवन,
यह धरा-धाम,यह नील गगन।
ऐ धीर, वीर, हम्मीर! तुझे
इस कवि के सौ-सौ बार नमन।४

जंगल-जंगल नक्सलियों से
जूझते मिला तू कई बार।
जब आया लिपट तिरंगे में,
यह कवि रोया है ज़ार-ज़ार।

जन-गण की रक्षा की ख़ातिर
तूने सर्वस्व लुटाया है।
कर प्राण निछावर, मातृभूमि का,
सचमुच कर्ज़ चुकाया है।

शूलों में फूलों के समान
है हँसा सदा तेरा जीवन।
ऐ धीर, वीर, हम्मीर! तुझे
इस कवि के सौ-सौ बार नमन।५।

सीमा के अन्दर भी कवि ने
देखे हैं तेरे कई रूप।
गर्मी-वर्षा में अटल छत्र,
शीतल ऋतु में गुनगुनी धूप।

तू कदम कदम पर रक्षा करता
दीखा नगरों-ग्रामों में।
विजयी बनकर लौटा सदैव
संघर्षों में, संग्रामों में।

है कोटि धन्यवाद के योग्य
यह सहनशक्ति, यह अनुशासन।
ऐ धीर, वीर, हम्मीर! तुझे
इस कवि के सौ-सौ बार नमन।६।

क्या आती तुझको याद कभी
बिछुओं की छनक नहीं होगी?
पायल,कँगने की झनकों सँग
चूड़ी की खनक नहीं होगी?

क्या आते याद नहीं होंगे
वे कच्चे धागे राखी के?
आँखों में तैरा ही करते
होंगे मौसम बैसाखी के।

तरसाते ही होंगे गुड्डा-
गुड़ियों के कोमलकान्त बदन।
ऐ धीर, वीर, हम्मीर! तुझे
इस कवि के सौ-सौ बार नमन।७।

तुझ पर गर्वित है राष्ट्र-पिता,
यह मातृभूमि, यह भू-मण्डल।
भयभीत सदा रहते तुझसे
अपघाती नेताओं के दल।

बलि-बलि जाते भारतवासी
तेरी गौरव-गरिमा विलोक।ं
विश्वास तुझे सौंपकर हुआ,
यह लोकतन्त्र अ-विकल अ-शोक।

श्रद्धा से शीश झुका तुझको
दे रहा प्रणति यह जन-गण-मन।
ऐ धीर, वीर, हम्मीर! तुझे
इस कवि के सौ-सौ बार नमन।८।

हैं शब्द न कवि के पास कि जो
तेरा गुरु गौरव गा पाये।
संवेदन से भरपूर चित्त
तेरा यत्किंच रिझा पाए।

जनता ने तो, बस, आरोपों के
तुझ तीर चलाये हैं।
हाँ, बलिदानों की वेला में
सब रोये हैं, पछताए हैं।

तू ही है कवि की आरतियाँ,
तू ही है कवि के गीत, भजन।
ऐ धीर, वीर, हम्मीर! तुझे
इस कवि के सौ-सौ बार नमन।९।


रचनाकार-आचार्य देवेन्द्र देव, बरेली।

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