कविता : इतनी सर्दी में यह खिड़की किसने खोली, चिड़िया बोली

(बाल कविता)
चिड़िया बोली।

बन्द घोंसले में छोटा-सा
छेद देख नाराज़ हो गयी।
‘इतनी सर्दी में यह खिड़की
किसने खोली?’ चिड़िया बोली।.

‘होती हो नाराज़ भला क्यों?
हम आए हैं संगी-साथी,
धूप खिली है, आओ खेलें
आँख मिचौली’ चिड़िया बोली।।

‘ऐसी ठंडक में तुम कैसे
रोज़ नहा लेती हो दीदी!’
‘नहीं नहायी,सुबह-सुबह
बस, पूँछ भिगोली’ चिड़िया बोली।

‘ना चूँगा, ना दाना-पानी,
परेशान करता है कोहरा’,
‘सर्दी की अब उठने ही
वाली है डोली’ चिड़िया बोली।।

‘कहाँ खेलने की फ़ुर्सत है,
अभी माफ़ कर दो तुम मुझको।
खेलेंगे इक्कीस मार्च को
जमकर होली’ चिड़िया बोली।।

आचार्य देवेंद्र देव

-आचार्य देवेन्द्र देव (बरेली प्रवास)

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