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व्यंग विनोद : 2018 की सबसे बड़ी भूल, रेत क्यों नही बनाया सुपर प्रोडक्ट, नव वर्ष में दिलाइए सम्मान

पीलीभीत : वर्ष 2018 में पीलीभीत जिले से सरकार की 1-D=1-P योजना में बांसुरी को चयनित किया गया। यह शायद सबसे बड़ी भूल थी। जिले में कहीं भी बांसुरी बजती नजर नहीं आ रही है। स्वागत सत्कार व प्रतीक चिन्ह के रूप में बांसुरी देने की परंपरा का चलन भी मेडम की डांट के बाद से फीका पड़ता नजर आ रहा है। व्यंगकार का तर्क है कि अगर रेत को इस योजना में चयनित कर लिया जाता तो काफी अच्छा रहता। दरअसल वर्ष 2018 में रेत को लेकर जिलेभर में गहमागहमी का माहौल रहा। जहां देवहा पर रेत खनन के पट्टे उनकी वैधता आदि पर साल भर हंगामा होता रहा वहीं शहर से लेकर गांव देहात तक रेत व मिट्टी खनन बंदिश के बावजूद चरम पर रहा। रेत को जिले में सोना कहा जाए तो कुछ भी गलत नहीं होगा। एक दौर था जब साहब लोगों के खजाने की बरकत अन्य स्रोतों से अधिक होती थी। आज के समय में रेत सोना उगलने का काम कर रही है। थाने चौकी हो या कोई दूसरे बड़े साहब का ऑफिस, हर कहीं रेत नजर आती है। कई खद्दरधारी भी इस धंधे से जुड़ गए और मोटी कमाई कर रहे हैं। जिन्हें लोग बेवकूफ समझते हैं वे हर रोज लाखों कमा रहे हैं। कई का पूरा कुनबा रेटबाज हो गया। जो इस महान धंधे से नहीं जुड़ पाए वे दूसरों के काम में अड़ंगा लगाने का काम कर रहे हैं। जिनकी गाड़ी में सरकारी पार्टी का बड़ा झंडा नजर आ जाए समझ लो वे रेत के खेल में परफेक्ट हैं। ऐसा नहीं है कि रेत मिटटी खनन पर बंदिश लगाने को कोई “नमक का दारोगा” आगे न आया हो पर नमक की जगह रेत डकारने वाले मगरमच्छ अधिक हैं। इसीलिए पूरी रात दाल की भाति काली नजर आती हैं। आँख कान बंद करके पहरेदार गहरी नींद सो जाते हैं। अगर जनता को एक डनलप रेत या मिटटी चाहिए तो 50 तरह की बंदिशें हैं। चौकीदार भी एसपी की भांति पेश आता है। लेखपाल साहब खुद को राज्यपाल समझ कर व्यवहार करते हैं। डेली कस्टमर है और निजी कर देता है तब सारे कायदे क़ानून ख़त्म। विकास कार्य हों या गरीब के आशियाने का निर्माण महंगी रेत लेनी ही पड़ेगी। शासन या प्रशासन ने भले ही रेत ब्रांडेड प्रोडक्ट में शामिल नहीं किया पर जिले के माननीयों और साहब लोगों ने इस प्रोडक्ट को ख़ास बना दिया है। अनुरोध है कि लेख पढ़कर 2019 में यह प्रोडक्ट मत बंद करवा देना साहब वरना न जाने कितनों की रोजी रोटी छिन जायेगी और तोहमत मेरे सर आएगी। एक ट्राली से काम शुरू करने वाले 10 ट्रेक्टर ट्राली खरीद चुके हैं उनकी बरकत कहीं रुक न जाए वरना बद्दुआयें लगेगी। हमारी मांग है कि 2019 को रेत वर्ष घोषित कर दिया जाय। धंधे से जुड़े लोग अगर स्वेच्छा से 10 या 5 फीसदी ही दे दें तो जनपद पूरी तरह विकसित हो जाए। देवहा और शारदा की भांति गोमती पर भी धंधेबाज दयादृष्टि करें और उन्हें सेवा का अवसर दिया जाय तो धारा प्रवाहित होने लगे। और हाँ सबसे बड़े कामगार को रेत पुरस्कार भी दिया जा सकता है। 2019 में रेत की 5, 10, 25, 50 किलोग्राम की सुंदर पैकिंग करवाकर बिक्री करवाई जा सकती है। पीलीभीत महोत्सव में सुपर प्रोडक्ट का प्रदर्शन कराया जा सकता है। हमने तो सारे पत्ते खोल दिए अगर आप पर कोई और महान आइडिया हो तो अवश्य बताएं। सीधे योगी जी को ट्वीट करें या चौकीदार को मन की बात सुनाएं। नामदार भी आयेगे 2019 में उन्हें भी सोना उगलने वाली खानें जरूर दिखाएं।
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(नोट-अन्यथा न लें “यूँ ही” लिख गई “अचूक” की कलम से)

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