कवि व पत्रकार सतीश मिश्र “अचूक” की तीसरी पुस्तक “लॉक डाउन के शॉक” की एआई द्वारा की गई साहित्यक समीक्षा

“लॉक डाउन के शॉक” : ठहरी हुई दुनिया की धड़कनों का काव्य-दस्तावेज

कवि व पत्रकार सतीश मिश्र “अचूक” की तीसरी कृति

साहित्य अपने समय की धड़कनों को शब्द देता है। जब इतिहास किसी असाधारण संकट से गुजरता है, तब संवेदनशील रचनाकार केवल घटनाओं का साक्षी नहीं रहता, बल्कि उन घटनाओं के भीतर छिपी मानवीय पीड़ा, आशंका, करुणा, संघर्ष और उम्मीद को अपनी रचनाशीलता में संजो लेता है। वर्ष 2020 का कोरोना काल ऐसा ही एक अभूतपूर्व समय था, जब पूरी दुनिया जैसे अचानक ठहर गई थी। सड़कें सूनी थीं, बाजार बंद थे, घरों के दरवाजे भीतर से बंद थे और मनुष्य अदृश्य शत्रु के भय से घिरा हुआ था।

इसी वैश्विक त्रासदी के बीच कवि एवं पत्रकार सतीश मिश्र “अचूक” ने अपने सृजनात्मक कर्म से उस समय की धड़कनों को शब्दबद्ध किया। उनकी तीसरी पुस्तक “लॉक डाउन के शॉक” इसी असाधारण कालखंड की काव्यात्मक स्मृति है। यह पुस्तक कोरोना महामारी के दौरान घटित घटनाओं, बदलते सामाजिक परिवेश, मानवीय संवेदनाओं, सेवा-भाव, भय, चिंता और भविष्य की आकांक्षाओं को विविध काव्य-विधाओं में अभिव्यक्त करती है।

इस कृति को पढ़ते हुए लगता है कि कवि ने लॉकडाउन के दिनों में अपनी खिड़की से केवल बाहर का दृश्य नहीं देखा, बल्कि उस दृश्य के पीछे छिपे पूरे समय को पढ़ने का प्रयास किया है।

आपदा के अंधकार में सृजन का दीप

कोरोना काल में जब अधिकांश जीवन गतिविधियां विराम की स्थिति में थीं, तब कवि ने इस ठहराव को सृजन का अवसर बनाया। वर्ष 2020 में लगे लॉकडाउन के दौरान मिले अवकाश का सदुपयोग करते हुए उन्होंने तत्कालीन घटनाओं और दृश्यों पर निरंतर लेखन किया।

यही इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण रचनात्मक विशेषता है कि इसमें घटनाएं इतिहास बन जाने के बाद स्मरण नहीं की गई हैं, बल्कि घटनाओं के घटित होते समय ही उन्हें कविता में दर्ज किया गया है। इसलिए इसकी रचनाओं में ताजगी, तात्कालिकता और प्रत्यक्ष अनुभूति का विशेष प्रभाव दिखाई देता है।

पुस्तक का प्रकाशन भी कोविड काल में ही हुआ और इसका निशुल्क वितरण किया गया। परिणामतः यह कृति उस समय पाठकों तक पहुंची, जब समाज स्वयं उन्हीं परिस्थितियों से गुजर रहा था जिन्हें कवि ने अपने शब्दों में अभिव्यक्त किया था। इसीलिए पुस्तक और पाठक के बीच संबंध केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि अनुभवात्मक भी बन गया।

समय के दृश्यों को कविता में बदलने की कला

“लॉक डाउन के शॉक” का कथ्य मूलतः कोरोना काल के सामाजिक और मानवीय दृश्यों से निर्मित है। लेकिन कवि की दृष्टि केवल घटनाओं के बाहरी रूप तक सीमित नहीं रहती। वह उन दृश्यों के भीतर छिपी मनुष्य की मनःस्थिति को भी पकड़ती है।

एक ओर महामारी का भय है, दूसरी ओर उससे लड़ते कोरोना योद्धाओं का साहस; एक ओर बंद दरवाजों की विवशता है, दूसरी ओर जरूरतमंदों के लिए खुलते सेवा के हाथ; एक ओर भविष्य की अनिश्चितता है तो दूसरी ओर संकट से उबरने की अदम्य आशा।

इस दृष्टि से यह पुस्तक कोरोना की घटनाओं का मात्र विवरण नहीं, बल्कि उस कालखंड की सामूहिक मनःस्थिति का काव्यात्मक आख्यान है।

विविध काव्य-विधाओं में अभिव्यक्ति

164 पृष्ठों की यह पुस्तक काव्य-विधाओं की दृष्टि से भी विविधतापूर्ण है। कवि ने कुंडलिया, गीत, गजल, दोहा और चौपाई जैसे पारंपरिक एवं लोकप्रिय काव्य-रूपों को माध्यम बनाकर कोरोना काल की अनुभूतियों को अभिव्यक्ति दी है।

विशेष रूप से कुंडलिया छंद का प्रयोग पुस्तक को विशिष्ट पहचान देता है। सीमित छंद-परिधि में किसी विस्तृत सामाजिक परिस्थिति को समेटना सहज नहीं होता, किंतु कवि ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए घटनाओं, संदेशों और अनुभूतियों को छंदबद्ध स्वर प्रदान किया है।

पुस्तक की पूरी छपाई रंगीन है, जो इसके दृश्यात्मक स्वरूप को भी आकर्षक बनाती है।

सात सोपानों में समय का क्रमिक आख्यान

पुस्तक को सात सोपानों में विभाजित करना केवल संरचनात्मक प्रयोग नहीं, बल्कि विषय को क्रमिक विस्तार देने की रचनात्मक युक्ति भी है। प्रत्येक सोपान कोरोना काल के एक अलग मनोभाव और सामाजिक पक्ष को सामने लाता है।

प्रथम सोपान : वंदना

किसी भी महाविपत्ति के सामने मनुष्य सबसे पहले अपनी आस्था की ओर लौटता है। प्रथम सोपान में देवी-देवताओं से कोरोना महामारी के अंत और मानवता की रक्षा के लिए प्रार्थना की गई है। यहां भय के बीच आस्था आश्रय बनती है और प्रार्थना संकट से मुक्ति की सामूहिक आकांक्षा का स्वर ग्रहण कर लेती है।

द्वितीय सोपान : लॉकडाउन के शॉक

यह पुस्तक का केंद्रीय संवेदनात्मक क्षेत्र कहा जा सकता है। इसमें लॉकडाउन से उत्पन्न झटकों, सामाजिक ठहराव और बदलती जीवन-व्यवस्था को सजीव रूप में उकेरा गया है। मानो कवि उस समय के सूने रास्तों, बंद प्रतिष्ठानों और घरों में सिमटे जीवन के चित्रों को एक-एक करके शब्दों में टांकता चलता है।

तृतीय सोपान : सार्थक कार्य और बदलाव

संकट केवल विनाश नहीं लाता; वह मनुष्य को नए रास्ते खोजने के लिए भी प्रेरित करता है। इस सोपान में कोरोना काल में हुए सार्थक कार्यों तथा जीवन में आए परिवर्तनों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। बदलते व्यवहार और नई सामाजिक परिस्थितियों को यहां रचनात्मक दृष्टि से देखा गया है।

चतुर्थ सोपान : भविष्य की चिंताएं

वर्तमान का संकट समाप्त होने से पहले ही भविष्य की चिंता मनुष्य को घेरने लगी थी। रोजगार, अर्थव्यवस्था, जीवन-व्यवस्था और सामाजिक भविष्य को लेकर उठे प्रश्न इस सोपान में अभिव्यक्त होते हैं। यहां कवि की दृष्टि वर्तमान से आगे जाकर आने वाले समय की ओर देखती है।

पंचम सोपान : मददगार

महामारी के अंधकार में जिन लोगों ने सेवा और सहायता का प्रकाश जलाए रखा, यह सोपान उन्हें समर्पित भाव से स्मरण करता है। कोरोना योद्धाओं और मददगारों के प्रति कृतज्ञता इस खंड को विशेष मानवीय ऊष्मा प्रदान करती है।

षष्ठ सोपान : निदान

हर संकट अपने साथ समाधान की तलाश भी लाता है। यह सोपान महामारी से मुक्ति के उपायों और निदान की ओर संकेत करता है। यहां भय से आगे बढ़कर आशा और समाधान की आकांक्षा दिखाई देती है।

सप्तम सोपान : सामूहिक काव्य-स्वर

अंतिम सोपान में कोविड-19 पर आधारित 40 सुप्रसिद्ध कवियों की रचनाओं को संकलित किया गया है। इस समावेश से पुस्तक का स्वर एकल कंठ से निकलकर सामूहिक स्वर में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार “लॉक डाउन के शॉक” व्यक्तिगत अनुभूति से आगे बढ़कर कोरोना काल की सामूहिक साहित्यिक चेतना का दस्तावेज बन जाती है।

पुस्तक की संरचना का संकेत कवि ने अपनी कुंडलिया में भी दिया है—

«चालिस दोहा गीत हैं सप्त सोपान।
त्रय अशीति शत तीन हैं कुंडलियां लो जान।
कुंडलियां लो जान सभी को पढ़ कर बढ़ना।
त्रय दर्जन संदेश संजोये सबको पढ़ना।
पंडित जी की भूमिका विश्व सजा है शीश।
कोरोना से युद्ध में उतरे कवि चालीस।।»

ये पंक्तियां पुस्तक की विषय-वस्तु और संरचना का संक्षिप्त काव्यात्मक परिचय भी देती हैं।

समर्पण में दिखाई देती संवेदना

कवि ने इस पुस्तक को कोरोना योद्धाओं को समर्पित किया है। डॉक्टरों, नर्सों, पुलिसकर्मियों, पत्रकारों, जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों तथा ज्ञात-अज्ञात रूप से महामारी के विरुद्ध संघर्ष करने वाले सभी लोगों को समर्पण इस कृति की संवेदनशीलता को रेखांकित करता है।

यह समर्पण केवल औपचारिक नहीं प्रतीत होता; यह उस समय के प्रति कृतज्ञ स्मरण है, जब अपने-अपने दायित्वों का निर्वहन करने वाले असंख्य लोगों ने मानव जीवन की रक्षा के लिए जोखिम उठाया।

विद्वत् संदेशों से विस्तृत होता साहित्यिक परिप्रेक्ष्य

पुस्तक की भूमिका पंडित राम अवतार शर्मा ने लिखी है। इसके अतिरिक्त साहित्य, पत्रकारिता, प्रशासन, राजनीति, शिक्षा, सामाजिक सेवा और जनसंचार से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों के संदेश इसमें संकलित हैं।

डॉ. राहुल अवस्थी, संतोष कुमार गंगवार, केशव अग्रवाल, हृदय नारायण दीक्षित, सुशील सीतापुरी, लक्ष्मी नारायण चौधरी, श्रीकांत सिंह, वरुण गांधी, अशोक वाजपेई एडवोकेट, सुनील कुमार शुक्ला, परिधि शर्मा, डॉ. अखिलेश कुमार मिश्रा, आशुतोष दीक्षित राजू, बाबूराम पासवान, डॉ. विवेक पांडेय, डॉ. विनोद तिवारी, जितेंद्र कुमार मिश्रा, वैभव श्रीवास्तव, अजमेर सिंह छीना, सुखदेव सिंह, दिलीप शुक्ला, एम.एस. यादव, सुशील चंद्र तिवारी, आदित्य शुक्ला, संदीप सिंह, अभिषेक दीक्षित, दीपिका चतुर्वेदी, स्वर्गीय अनूप मानव शास्त्री, महेश चंद्र मिश्र, अभय शंकर गौड़, डॉ. अविनाश झा, मीनू खरे, तारिक कुरैशी, रामकृष्ण वाजपेई, मंदीप कौर चड्ढा, वी.के. जिज्ञासु, संजीव द्विवेदी, आचार्य देवेंद्र देव, राम शंकर अग्निहोत्री ‘राम भैया’ सहित अनेक व्यक्तित्वों के संदेश और बाबा सूरज गिरि जी महाराज का आशीर्वाद इस कृति के सामाजिक विस्तार को दर्शाते हैं।

इन संदेशों का महत्व इस दृष्टि से भी है कि वे पुस्तक को केवल एक रचनाकार की निजी अभिव्यक्ति न रहने देकर उसके समय और समाज से संवाद करती हुई कृति का स्वर प्रदान करते हैं।

मुद्रित पृष्ठों से डिजिटल संसार तक

कोरोना काल में जब पारंपरिक साहित्यिक आयोजन लगभग थम गए थे, डिजिटल माध्यमों ने अभिव्यक्ति के नए द्वार खोले। “लॉक डाउन के शॉक” की रचनाओं और इससे जुड़े वीडियो संदेशों को फेसबुक तथा यूट्यूब पर प्रसारित किया गया। पुस्तक की अनेक रचनाएं आकाशवाणी से भी प्रसारित हुईं।

इस प्रकार इस कृति की यात्रा पुस्तक के पृष्ठों से निकलकर रेडियो, सोशल मीडिया और डिजिटल संसार तक पहुंची। यह पहल उस समय साहित्य की बदलती संचार-भूमिका को भी रेखांकित करती है।

विमोचन और पाठकीय पहुंच

पुस्तक का विमोचन शिव शक्ति धाम मंदिर, अशोक कॉलोनी, पूरनपुर के प्रांगण में विधायक बाबूराम पासवान, जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ. दलजीत गुरुभाग सिंह आदि की उपस्थिति में हुआ। साहित्यिक आयोजनों में भी इसका निशुल्क वितरण किया गया।

निशुल्क वितरण ने पुस्तक को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिस समय पूरा समाज कोरोना की विभीषिका का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा था, उसी समय उस अनुभव को शब्द देती पुस्तक पाठकों के हाथों में पहुंची। शायद यही कारण रहा कि कृति को पाठकों से आत्मीय प्रतिक्रिया मिली।

समीक्षकीय दृष्टि से

“लॉक डाउन के शॉक” को पढ़ते हुए इसकी सबसे प्रमुख विशेषता समय-बोध के रूप में सामने आती है। कवि ने कोरोना को केवल एक बीमारी के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, मानसिक और मानवीय जीवन में आए व्यापक परिवर्तन के रूप में अनुभव किया।

इस कृति का महत्व इस बात में निहित है कि यह महामारी की बड़ी वैश्विक कथा को स्थानीय और मानवीय अनुभवों के माध्यम से पकड़ने का प्रयास करती है। इतिहास आंकड़ों और दस्तावेजों में किसी घटना को सुरक्षित रख सकता है, किंतु साहित्य उस घटना के भीतर धड़कते मनुष्य को सुरक्षित रखता है। “लॉक डाउन के शॉक” इसी अर्थ में अपने समय के मनुष्य की अनुभूतियों को शब्दों में संरक्षित करती है।

कवि का पत्रकार होना भी इस रचना-दृष्टि को प्रभावित करता दिखाई देता है। घटनाओं को निकट से देखने, तत्काल प्रतिक्रिया दर्ज करने और सामाजिक परिवेश के सूक्ष्म परिवर्तनों को पहचानने की पत्रकारिता-दृष्टि तथा भावों को छंद और कविता में ढालने की साहित्यिक संवेदना—दोनों का संगम इस कृति में दिखाई देता है।

निष्कर्ष : स्मृति में सुरक्षित एक असाधारण समय

“लॉक डाउन के शॉक” अंततः उस समय की काव्यात्मक स्मृति है, जब मानव सभ्यता ने अपने आधुनिक इतिहास के सबसे असाधारण संकटों में से एक का सामना किया। यह पुस्तक उस भय को दर्ज करती है, पर केवल भय तक सीमित नहीं रहती; वह आस्था को भी दर्ज करती है। वह पीड़ा को शब्द देती है, पर सेवा और संवेदना को भी विस्मृत नहीं होने देती। वह भविष्य की चिंता करती है, किंतु समाधान और आशा के द्वार भी तलाशती है।

सतीश मिश्र “अचूक” ने इस कृति के माध्यम से कोरोना काल को केवल देखा नहीं, उसे जिया, महसूस किया और शब्दों में संरक्षित किया है। यही कारण है कि “लॉक डाउन के शॉक” को केवल कविताओं का संकलन कहना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित करना होगा।

यह कृति उस समय की सामूहिक स्मृति, मानवीय संवेदना और सामाजिक अनुभव का काव्यात्मक अभिलेख है—एक ऐसा साहित्यिक दस्तावेज, जो आने वाले समय में पाठकों को यह याद दिलाता रहेगा कि जब दुनिया ठहर गई थी, तब भी मनुष्य की संवेदना और साहित्य की सृजन-धारा गतिमान थी।

“दुनिया के कदम थम गए थे,
पर शब्द चलते रहे—
और उन्हीं चलते हुए शब्दों ने
एक ठहरे हुए समय को
स्मृति में अमर कर दिया।”

— “अचूकनामा” हेतु एआइ निर्मित साहित्यिक समीक्षा

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