कवि व पत्रकार सतीश मिश्र “अचूक” की प्रथम पुस्तक “मातेश्वरि गूंगा देवी” की एआइ ने की सुंदर समीक्षा

मातेश्वरी गूंगा देवी : आस्था, लोकस्मृति और काव्य का अनुपम आख्यान
कवि एवं पत्रकार सतीश मिश्र ‘अचूक’ की प्रथम पुस्तक

‘मातेश्वरी गूंगा देवी’ कवि एवं पत्रकार सतीश मिश्र ‘अचूक’ की प्रथम प्रकाशित कृति है, जिसका प्रकाशन वर्ष 1994 में हुआ। माती मंदिर प्रांगण में इसका विमोचन हुआ। मां गूंगा देवी की महिमा, माती मंदिर की धार्मिक परंपरा तथा उससे जुड़ी ऐतिहासिक, पौराणिक और लोकविश्वासों की कथा को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करने वाली यह पुस्तक अपने विषय की दृष्टि से विशिष्ट महत्व रखती है।
पुस्तक का साहित्यिक महत्व
साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, संस्कृति, आस्था और संवेदना का संरक्षण भी है। ‘मातेश्वरी गूंगा देवी’ इसी अर्थ में एक महत्वपूर्ण कृति है। इसमें माती क्षेत्र की धार्मिक आस्था को काव्य का स्वर दिया गया है।
इस पुस्तक को राधेश्याम रामायण की तर्ज पर लिखा गया है। इसलिए इसकी कथा में ऐसा प्रवाह और लयात्मकता दिखाई देती है, जो इसे केवल पढ़ने के लिए ही नहीं, बल्कि सुनने और गाने के लिए भी अनुकूल बनाती है।
कृति में इतिहास, पुराण और धर्म का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। लेखक ने मां गूंगा देवी से जुड़ी कथा और महिमा को इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि पाठक के सामने केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि माती की सांस्कृतिक स्मृति का भी एक चित्र उभरता है।
1994 में माती मंदिर प्रांगण में विमोचन
पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 1994 में हुआ और इसका विमोचन माती मंदिर प्रांगण में किया गया। विमोचन से पूर्व उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन चिकित्सा एवं स्वास्थ्य राज्यमंत्री डॉ. विनोद तिवारी जी द्वारा पुस्तक के संबंध में पहल की गई और पुस्तक का निःशुल्क वितरण किया गया।
इस प्रकार पुस्तक का आरंभ ही साहित्य, धर्म और लोकसेवा के त्रिवेणी-संगम के रूप में हुआ। पुस्तक को आम लोगों तक निःशुल्क पहुंचाने से मां गूंगा देवी की कथा व्यापक जनसमुदाय तक पहुंची।
पुस्तक से लोककंठ तक पहुंची मां की कथा
किसी पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि तब होती है, जब उसके शब्द पुस्तक के पन्नों से निकलकर लोगों की स्मृति और वाणी का हिस्सा बन जाएं। ‘मातेश्वरी गूंगा देवी’ के साथ यही हुआ।
आज भी मां गूंगा देवी की इस कथा को अनेक स्थानों पर घर-घर में गाया जाता है। इस प्रकार पुस्तक एक लिखित साहित्यिक कृति होने के साथ-साथ लोकपरंपरा का हिस्सा बन गई है।
कथावाचक पंडित मुनीश कुमार मिश्रा द्वारा इस कथा का कई बार हारमोनियम और ढोलक की संगति में साप्ताहिक कथा के रूप में गायन एवं वाचन किया गया। इससे पुस्तक की कथा को श्रव्य और लोकपरंपरागत स्वरूप मिला।
कथा का इस प्रकार गायन इस बात का प्रमाण है कि पुस्तक का प्रभाव केवल पाठकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने जनमानस में अपनी अलग जगह बनाई।
माती मंदिर पर मां की महिमा का प्रथम पुस्तकाकार प्रयास
माती मंदिर पर मां की महिमा का बखान करने वाली यह प्रथम पुस्तक मानी जाती है। इस दृष्टि से इसका सांस्कृतिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
किसी धार्मिक स्थल की पहचान केवल उसके मंदिर या धार्मिक अनुष्ठानों से नहीं बनती। उससे जुड़ी कथाएं, लोकविश्वास, किंवदंतियां और पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियां भी उसकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं।
‘मातेश्वरी गूंगा देवी’ ने माती की इसी धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को शब्दों में सुरक्षित करने का कार्य किया।
माती क्षेत्र के विकास से जुड़ा संदर्भ
पुस्तक के विमोचन के समय माती मंदिर क्षेत्र के विकास से संबंधित घोषणाएं भी हुईं। इसके बाद देवी मंदिर तक सीसी रोड, स्वागत द्वार, यात्री विश्रामालय तथा भुगनइ ताल तक खड़ंजे का निर्माण कराया गया।
बाद में भुगनइ ताल के सौंदर्यीकरण पर लगभग 9 करोड़ रुपये खर्च किए गए। पर्यटन विभाग द्वारा लगभग 94 लाख रुपये की लागत से यात्री सुविधा केंद्र, शौचालय आदि सुविधाओं का निर्माण कराया गया। प्राचीन मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य भी हुआ।
इन घटनाओं को माती क्षेत्र की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान के विकासक्रम के संदर्भ में देखना महत्वपूर्ण है। पुस्तक ने जहां मां की कथा और महिमा को शब्द प्रदान किए, वहीं समय के साथ मंदिर और आसपास के क्षेत्र में सुविधाओं तथा संरक्षण का विस्तार हुआ।
विद्वानों द्वारा सराहना
‘मातेश्वरी गूंगा देवी’ की अनेक विद्वानों और साहित्यप्रेमियों ने सराहना की है तथा इस कृति पर समीक्षाएं भी लिखी गई हैं।
स्थानीय धार्मिक आख्यान को काव्य का स्वर देना अपने आप में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्य है। लेखक ने लोकविश्वास और धार्मिक भावनाओं को साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान करके इस कथा को स्थायी रूप देने का प्रयास किया है।
लोकस्मृति का साहित्यिक दस्तावेज
आज जब मौखिक परंपराएं तेजी से बदल रही हैं, तब ऐसी पुस्तकों का महत्व और बढ़ जाता है। लोककथाएं यदि केवल मौखिक परंपरा तक सीमित रहें तो समय के साथ उनके अनेक अंश विस्मृत हो सकते हैं। पुस्तक उन्हें अक्षरों में सुरक्षित कर देती है।
इस दृष्टि से ‘मातेश्वरी गूंगा देवी’ को माती की धार्मिक और सांस्कृतिक लोकस्मृति का साहित्यिक दस्तावेज कहा जा सकता है।
सतीश मिश्र ‘अचूक’ की साहित्यिक यात्रा का प्रथम पड़ाव
‘मातेश्वरी गूंगा देवी’ सतीश मिश्र ‘अचूक’ की साहित्यिक यात्रा का प्रारंभिक महत्वपूर्ण पड़ाव है। वर्ष 1994 में प्रकाशित इस प्रथम कृति में ही उनके लेखन का वह पक्ष दिखाई देता है, जो लोकजीवन, धार्मिक आस्था और क्षेत्रीय संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है।
यह कृति आगे विकसित होने वाली उनकी साहित्यिक यात्रा की आधारभूमि के रूप में भी देखी जा सकती है।
निष्कर्ष
समग्र रूप से ‘मातेश्वरी गूंगा देवी’ केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि आस्था, लोकस्मृति, इतिहास, पौराणिक चेतना और काव्य का संगम है।
राधेश्याम रामायण की तर्ज पर लिखी गई इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी कथा पुस्तक के पन्नों तक सीमित नहीं रही। वह कथावाचन, गायन और लोकपरंपरा के माध्यम से जनमानस तक पहुंची और आज भी मां गूंगा देवी की कथा के रूप में लोगों के बीच जीवित है।
माती मंदिर पर मां की महिमा का प्रथम पुस्तकाकार प्रयास होने के कारण यह कृति माती की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के इतिहास में अपना विशिष्ट स्थान रखती है।
‘मातेश्वरी गूंगा देवी’ माती की आस्था का काव्य है, लोकस्मृति का दस्तावेज है और मां की महिमा को जन-जन तक पहुंचाने वाली एक भावपूर्ण साहित्यिक कृति है।
जय माता दी।
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