संपादकीय : कांट्रेक्ट फार्मिंग में अभी तक तो घाटे में रहे हैं किसान, जानिए कैसे?

संपादकीय- सतीश मिश्र संपादक समाचार दर्शन 24 

कांटेक्ट फार्मिंग: शायद इस व्यवस्था के तहत वर्षों से चीनी मिलें किसानों का गन्ना खरीदतीं हैं। 14 दिन में भुगतान देने का लिखित नियम है पर क्या इस अवधि में किसी भी किसान को भुगतान मिलता है। नहीं ना। 14 महीने भी गुजर जाते हैं पेमेंट मिलने में। सरकार की भी नहीं सुनते मिल मालिक। गन्ना विभाग के अफसरों द्वारा मिलों को जो नोटिस दिए जाते हैं उन्हें वे निरन्तर डस्टबिन में फेंकते रहते हैं। किसानों का लाखों रुपया मिलें दबाए रहती हैं और किसानों को बैंक से लिये ऋण पर ब्याज व प्लांटी देनी पड़ती है। याद होगा कि किसान नेता Sardar VM Singh कोर्ट से ब्याज देने का आदेश लाये थे तब भी मिलों ने किसानों को ब्याज नहीं दिया। कोई भी सरकार इस नियम का पालन नहीं करा पाई। कारण आप सबको खोजने होंगे। गन्ना मूल्य बढ़ाने, आपूर्ति पर्चियां देने में भी किसानों का शोषण होता है। गन्ने की सर्वे चढ़वाने, सट्ठा ठीक कराने, सेंटर पर गन्ना लदवाई व मिल में उतराई भी किसानों को देनी पड़ती है जबकि यह दायित्व दूसरे पक्ष का है। पर कोई देखने वाला नहीं।
शायद इसी कारण किसान चिंतित होंगे कि आगे धान, गेहूं, मक्का, आलू व अन्य फल, सब्जियों की कांट्रेक्ट फार्मिग में भी गन्ने जैसा हाल न हो। क्योंकि निजी कंपनियां इन चीनी मिल मालिकों से भी सशक्त होंगी। कोई भी तर्क पक्ष विपक्ष में दे सकते हैं पर दलगत चश्मा उतारना जरूरी है।

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