अचूकवाणी : ला ना पाई कालाधन बंदी नोटों की…

नोटबन्दी
—-
बंदी नोटों की हुई, बोलो कितनी ठीक।
कालाधन आया कहो, या बदली कुछ लीक।
या बदली कुछ लीक बढ़ गए काले धंधे।
बढ़ता भ्रष्टाचार सफेदीधारक गंदे।
भारत में बर्बादी थी यह जन छोटों की।
ला ना पाई कालाधन बंदी नोटों की।।


शासक ने ऐसा किया बढ़ा नोट का अंक।

दो हजार के नोट पर भ्रष्टाचारी डंक।

भ्रष्टाचारी डंक बना रिश्वत का वाहक।

घुसा तिजोरी खोल भटकते सारे गाहक।

बंदी नोटों की मित्रों थी बुद्धीनाशक

हुआ न जरा सुधार मगर हर्षाता शासक।।

रचनाकार-


सतीश मिश्र अचूक

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