सम्पादकीय : सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में होनी चाहिए पढ़ाई

सिर्फ परीक्षा के समय ही की जाती है सीसीटीवी कैमरों से निगरानी

-माध्यमिक स्कूलों व डिग्री कॉलेजों में इनरोलमेंट के खेल पर नहीं लग पा रहा अंकुश

सरकार भले ही नई शिक्षा नीति लाकर अपनी पीठ खुद थप थपा रही हो परंतु मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में अभी इतनी अधिक खामियां हैं कि इनमें सुधार करने की जरूरत है। अगर माध्यमिक स्कूलों व डिग्री कालेजों की बात करें तो इन स्कूल कालेजों में परीक्षा के समय सीसीटीवी कैमरे ऑनलाइन माध्यम से जोड़कर जनपद व प्रदेश मुख्यालय पर निगरानी की जाती है। अगर यही निगरानी पढ़ाई के समय भी जारी रहे तो शायद शिक्षा का स्तर भी उठेगा और रिजल्ट भी बेहतर आएगा। परंतु हैरत की बात यह है कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विद्वानों ने अभी तक इस पर ध्यान ही नहीं दिया है। अथवा यूं कहें कि इनरोलमेंट के खेल के चलते कोई भी इस व्यवस्था को लागू करने को तैयार नहीं है। भले ही सब कुछ ऑनलाइन है व इस जमाने को डिजिटल युग कहा जाता है परंतु हकीकत यही है कि अभी भी कहीं न कहीं जुगाड़ू व्यवस्था जारी है। कक्षा 10 व 12 में ऐसे तमाम परीक्षार्थी बैठते हैं जो कभी स्कूल कॉलेजों में पढ़ाई करने नहीं जाते। गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों में पढ़कर मान्यता प्राप्त विद्यालयों में अपना पंजीकरण कराकर परीक्षा देने वालों की संख्या भी अच्छी खासी रहती है। कई जगह कक्षा 5 व कक्षा 8 तक की मान्यता पर चल रहे निजी विद्यालयों में हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की कक्षाएं भी संचालित की जा रही हैं इनको सुदूर विद्यालयों में पंजीकृत कराकर यह निजी विद्यालय मोटी रकम ऐंठते हैं वहीं पंजीकरण के नाम पर विद्यालयों को भी अच्छा खासा पैसा मिल जाता है। कई बार तो आधुनिक युग के यह विद्यार्थी घर पर रहकर ही पंजीकरण रूपी व्यवस्था का लाभ उठाते हुए परीक्षा में बैठते हैं। ऐसे अधिकांश परीक्षार्थी डिग्री कालेजों के हैं और शिक्षा व्यवस्था के लिए अभिशाप बने हुए हैं। केवल नाम के लिए डिग्री लेने वाले यह छात्र जहां सम्पूर्ण रिजल्ट खराब करते हैं वही ज्ञान का लोप भी इनके चलते होता है।
जांच का विषय यह है कि अगर कोई विद्यालय पीलीभीत जनपद की पूरनपुर तहसील में स्थापित है और उसके बच्चों को पीलीभीत सदर अथवा बीसलपुर के विद्यालयों में दाखिल कराया जाता है तो यह एक सीधे तौर पर जुगाड़ू व्यवस्था है। 2-4 फीसदी परीक्षार्थी तो ऐसे हो सकते हैं परंतु 100-200 की बड़ी संख्या में ऐसे विद्यार्थी होना अपने आप में व्यवस्था की पोल खोलते हैं परंतु शायद इस बात की जांच करने की जरूरत जनपद के शिक्षाधिकारियों ने नहीं समझी होगी। कहने को तो माध्यमिक विद्यालयों में बायोमेट्रिक हाजिरी की व्यवस्था भी लागू की गई है परंतु यह भी केवल कुछ विद्यालयों तक ही सीमित है। अगर बोर्ड व विश्व विद्यालयों की परीक्षा में शामिल होने के लिए 75 फीसदी उपस्थित की अनिवार्यता भी लागू कर दी जाए और बायोमेट्रिक हाजिरी प्रति माह शिक्षा विभाग व विवि अपने दफ्तर में स्कूल कालेजों से प्राप्त करके संग्रहित करे तो शायद आधे से अधिक परीक्षार्थी परीक्षा में बैठने से ही वंचित हो जाएंगे। जुगाड़ू व्यवस्था वाले खुद-ब-खुद इस सिस्टम के आने से परीक्षा से आउट हों जाएंगे। सबसे अच्छा सुझाव यह हो सकता है कि जिस तरह परीक्षा के समय सभी माध्यमिक विद्यालयों व डिग्री कालेजों के कैमरे वॉइस रिकॉर्डिंग के सहित ऑनलाइन मोड पर लेकर विवि व जिला मुख्यालय पर कंट्रोल रूम बनाकर निगरानी की जाती है, प्रदेश मुख्यालय तक परीक्षा की प्रक्रिया ऑनलाइन माध्यम से देखी जाती है। पढ़ाई के समय भी इन कैमरों को ऑनलाइन मोड़ पर रखकर जनपद मुख्यालय पर कंट्रोल रूम बनाकर निगरानी की जाए। क्लास में कितने बच्चे हैं और किस तरह की पढ़ाई कराई जा रही है। दिन में कितने पीरियड पढ़ाई होती है यह बात भी सामने आ जाएगी। सीसीटीवी कैमरों की रिकार्डिंग भी जमा कराई जा सकती है। ऐसी व्यवस्था बनाई जाती है तो शिक्षण व्यवस्था में निश्चित ही सुधार होगा। हैरत की बात तो यह है कि इस व्यवस्था के बारे में जनपद के अधिकारी तो अनभिज्ञ बने हुए हैं खुद को विद्वान कहने वाले डिग्री कालेजों व माध्यमिक विद्यालयों के कर्ता-धर्ता भी इस विषय पर खामोश है। शायद ही किसी संस्थाध्यक्ष ने ऐसी व्यवस्था की मांग की हो। गायत्री परिवार का ध्येय वाक्य है कि हम सुधरेंगे युग सुधरेगा, हम बदलेंगे युग बदलेगा। अगर इसे को डिग्री कॉलेज या माध्यमिक विद्यालय अपने यहां लागू करने की छोटी सी पहल कर दें तो जनपद भर में यह व्यवस्था पूर्ण रूप से लागू हो जाएगी और इसके सुखद परिणाम तो होंगे ही शिक्षा व्यवस्था में सुधार भी निश्चित रूप से होगा।
पीलीभीत जनपद के तमाम डिग्री कॉलेज ऐसे होंगे जहां वर्ष में 100 दिन भी पढ़ाई नहीं होती। नियमित पीरियड लगने की बात तो केवल कागजों में ही दर्शाई जाती है। अगर कैमरों की रिकॉर्डिंग निकलवाई जाए तो हकीकत खुद-ब-खुद सामने आ जाएगी। मोटा वेतन आहरित करने वाले प्रवक्ता यूं ही हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते हैं। उन्हें इंतजार रहता है छात्र-छात्राओं का कि कोई आए और वे क्लास शुरू करें परंतु ना तो डिजिटल युग के छात्र-छात्राएं पढ़ने में विश्वास रखते हैं और ना ही कालेजों के प्रबंधन के पास इतना समय है कि वे पढ़ाई का माहौल बनाने हेतु जागरूकता अभियान चलाएं। पूरे वर्ष पढ़ाई ना होने के बावजूद सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में परीक्षा कराना कहां का न्याय है। इस पर मंथन करने की जरूरत है। अगर इसी तरह ज्ञान का लोप होता रहा तो नई शिक्षा नीति लागू करने का कोई भी लाभ फिलहाल नहीं मिल पायेगा।

सतीश मिश्र ‘अचूक’, संपादक

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