चुनावी कुण्डलियां : वोटर वेलेंटाइन हो गया ‘रोज’ दे रहे रोज

आरक्षण
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आरक्षण ने शूरमा, आहत किये अनेक।
रहे कूदते दिए अब, घुटने सबने टेक।।
घुटने सबने टेक बहादुर मुरझाए हैं।
पूछ रहे कहिए आरक्षण क्यों लाये हैं।
कटुता बढ़ती कर भाईचारे का भक्षण।
सब समान फिर क्यों लाये ‘साहब’ आरक्षण।।
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सतीश मिश्र ‘अचूक’

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बदलाव
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रोज जगाते भोर ही, दिन भर लेते हाल।
सोने तक का साथ है, अजब अनोखी चाल।
अजब अनोखी चाल वोट को नेता डोलें।
बदजुबान थे लेकिन अब मिश्री सी घोलें।
बीड़ी, सिगरेट, चाय, मसाला, दें शराब की डोज।
वोटर वेलेंटाइन हो गया ‘रोज’ दे रहे रोज।।
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सतीश मिश्र ‘अचूक’ कवि पत्रकार मो-9411978000

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