
कवि व पत्रकार सतीश मिश्र “अचूक” की दूसरी पुस्तक “कलियुग के भगवान” की साहित्यक समीक्षा
‘कलियुग के भगवान’ : बदलते मानवीय मूल्यों का काव्यात्मक आईना
कवि व पत्रकार सतीश मिश्र ‘अचूक’ की पुस्तक ‘कलियुग के भगवान’ का साहित्यिक मूल्यांकन
हिंदी साहित्य में वे रचनाएँ विशेष महत्त्व रखती हैं, जो अपने समय की नब्ज को पहचानकर समाज के सामने उसका वास्तविक चेहरा प्रस्तुत करती हैं। कविता केवल भावों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समय, समाज और मनुष्य के अंतर्द्वंद्व का दस्तावेज भी होती है। कवि एवं पत्रकार सतीश मिश्र ‘अचूक’ की पुस्तक ‘कलियुग के भगवान’ इसी दृष्टि से उल्लेखनीय कृति है। वर्ष 2019 में प्रकाशित 102 पृष्ठों की यह पुस्तक कवि की रचनात्मक यात्रा की दूसरी कड़ी है, जिसमें गीत, दोहे, चौपाइयाँ, कुंडलिया छंद और राधेश्याम रामायणी छंद के माध्यम से समकालीन जीवन के विविध पक्षों को अभिव्यक्ति मिली है।
यह पुस्तक केवल कविताओं का संकलन नहीं है, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों, मनुष्य की मानसिकता, धार्मिक आस्था, राष्ट्रीय चेतना, स्थानीय संस्कृति, पारिवारिक संबंधों और व्यवस्था की विसंगतियों का बहुआयामी काव्य-दर्पण है। शीर्षक ‘कलियुग के भगवान’ अपने आप में पुस्तक की मूल संवेदना को उद्घाटित करता है। कवि ने यह प्रश्न उठाया है कि आज के समय में मनुष्य किन वस्तुओं, पदों और प्रवृत्तियों को भगवान का स्थान दे बैठा है।
शीर्षक में छिपा दार्शनिक प्रश्न
‘कलियुग के भगवान’ शीर्षक जितना सरल दिखाई देता है, उसका अर्थ उतना ही गहरा है। कवि की दृष्टि में कलियुग का मनुष्य परंपरागत अर्थों में भगवान को पूजने के साथ-साथ अनेक सांसारिक शक्तियों को भी भगवान का दर्जा देने लगा है।
किसी के लिए धन ही भगवान है, किसी के लिए पद और प्रतिष्ठा, तो कोई अपनी शक्ति, प्रभाव अथवा अहंकार में स्वयं को ही सर्वोच्च मान बैठता है। यही पुस्तक का दार्शनिक आधार बनता है।
कवि इस प्रवृत्ति का केवल उपहास नहीं करते, बल्कि उसके पीछे छिपे मानवीय मनोविज्ञान को भी स्पर्श करते हैं। इसीलिए पुस्तक का शीर्षक सामाजिक व्यंग्य के साथ-साथ एक दार्शनिक प्रश्न भी बन जाता है—मनुष्य की वास्तविक आस्था आखिर किसमें है?
यहीं से ‘कलियुग के भगवान’ सामान्य कविता-संग्रह से आगे बढ़कर आत्ममंथन का माध्यम बनती है।
समर्पण में माता-पिता के प्रति कृतज्ञता
कवि ने इस पुस्तक को अपने पिता स्व. पंडित जियालाल मिश्र और माता श्री प्रेमा देवी को समर्पित किया है। यह समर्पण पुस्तक की भावभूमि को आत्मीयता प्रदान करता है। साहित्यकार की रचनात्मक चेतना के पीछे परिवार, संस्कार और माता-पिता की भूमिका को स्वीकार करना भारतीय साहित्यिक परंपरा में सदैव महत्त्वपूर्ण रहा है।
पुस्तक का विमोचन भी कवि के पिता के नाम पर स्थापित पंडित जियालाल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, सपहा में कराया जाना इस समर्पण को केवल औपचारिक न रखकर सामाजिक स्मृति से जोड़ देता है। पुस्तक के विमोचन अवसर पर निःशुल्क वितरण और भंडारे का आयोजन भी साहित्य को जन-सामान्य तक पहुंचाने की कवि की भावना को रेखांकित करता है।
भूमिका और शुभकामना संदेशों का साहित्यिक परिवेश
पुस्तक की भूमिका परम विद्वान पंडित राम अवतार शर्मा ने लिखी है। वहीं अनेक गणमान्य व्यक्तियों, साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षाविदों और जनप्रतिनिधियों के शुभकामना संदेश पुस्तक के सामाजिक-साहित्यिक परिवेश को विस्तार देते हैं।
तत्कालीन सांसद एवं प्रमुख भाजपा नेता वरुण गांधी, विधायक बाबूराम पासवान, प्रधानाचार्य महेश चंद्र मिश्र, हास्य कवि देव शर्मा ‘विचित्र’, पूर्व मंत्री डॉ. विनोद तिवारी, अविनाश चंद्र मिश्रा, IAS डॉ. अखिलेश कुमार मिश्रा, बी.के. जिज्ञासु, आकाशवाणी लखनऊ के क्षेत्रीय समाचार एकांश के तत्कालीन प्रमुख दिलीप शुक्ला, एम.एस. यादव, सुशील चंद तिवारी, डिप्टी आरएमओ अविनाश झा, वरिष्ठ साहित्यकार आचार्य देवेंद्र देव, यू.आर. मीत, आलोक मिश्रा तथा वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री सहित अनेक व्यक्तियों के शुभकामना संदेश इस कृति के प्रति उस समय के साहित्यिक-सामाजिक जुड़ाव को दर्शाते हैं।
इन संदेशों का महत्त्व केवल नामों की उपस्थिति में नहीं, बल्कि इस तथ्य में है कि पुस्तक ने साहित्यिक संसार और सामाजिक जीवन के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद स्थापित किया।
काव्य-विधाओं की विविधता
‘कलियुग के भगवान’ की एक प्रमुख विशेषता इसकी छंद-विविधता है। कवि ने एक ही काव्य-विधा तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि गीत, दोहा, चौपाई, कुंडलिया छंद और राधेश्याम रामायणी छंद जैसी विविध विधाओं का प्रयोग किया है।
यह विविधता पुस्तक को एकरस होने से बचाती है। कहीं गीतात्मकता पाठक को भावलोक में ले जाती है, कहीं दोहे की संक्षिप्तता में तीखा कथ्य सामने आता है, तो कहीं कुंडलिया और चौपाई की लयात्मकता विचार को स्मरणीय बना देती है।
कवि की पत्रकारिता से जुड़ी दृष्टि भी उनके काव्य-शिल्प में दिखाई देती है। वे लंबे विवरण के बजाय अनेक स्थानों पर किसी घटना, प्रवृत्ति या विसंगति को संक्षिप्त और प्रभावशाली ढंग से सामने रखते हैं।
व्यंग्य : व्यवस्था के अंतर्विरोधों पर ‘अचूक’ प्रहार
सतीश मिश्र ‘अचूक’ की काव्य-चेतना का एक प्रमुख आधार व्यंग्य है। ‘तबाही में कमाई’, ‘अनोखा धंधा’, ‘कमीशन’, ‘गठबंधन सरकारें’, ‘किसान की दुर्गति’, ‘आरक्षण की होली’, ‘हिंदी बनाम द्रौपदी’, ‘टपरिया’, ‘सपने’, ‘मन की बात’, ‘टेंपो हाई है’, ‘प्रधान जी’, ‘देश भक्त सरकार’, ‘उलटा कानून’, ‘बलशाली दानव’, ‘तमन्ना’, ‘यूनिक सरकार’ और ‘कलियुग की देवी’ जैसी रचनाएँ सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन की विसंगतियों को व्यंग्यात्मक दृष्टि से सामने लाती हैं।
इन रचनाओं में कवि का उद्देश्य केवल हँसाना नहीं है। हास्य के पीछे एक चुभता हुआ प्रश्न छिपा है। पाठक पहले मुस्कराता है, फिर ठहरकर सोचता है कि जिस स्थिति पर वह हँस रहा है, कहीं वह उसी व्यवस्था का हिस्सा तो नहीं है।
यही व्यंग्य की सार्थकता है।
कवि के ‘अचूकवाण’ विशेष रूप से प्रभावशाली प्रतीत होते हैं। कम शब्दों में किसी सामाजिक स्थिति पर तीखी टिप्पणी करना उनके व्यंग्य-कौशल की पहचान बनता है। उनका व्यंग्य व्यक्ति-विरोध से अधिक प्रवृत्ति-विरोधी दिखाई देता है। इस कारण उसकी प्रासंगिकता व्यापक हो जाती है।
यथार्थ का निर्भीक चित्रण
‘कलियुग के भगवान’ में कवि कल्पना के संसार में पलायन नहीं करते, बल्कि अपने आसपास की दुनिया से सामग्री ग्रहण करते हैं। अंतर्मन की पीड़ा, पत्रकारों की व्यथा-कथा और भ्रष्टाचारी व्यवस्था का चित्रण इसी यथार्थवादी दृष्टि का प्रमाण है।
पत्रकार के रूप में समाज को निकट से देखने का अनुभव कवि के लिए रचनात्मक पूंजी बन जाता है। वे घटनाओं के बाहरी रूप से आगे जाकर उनके सामाजिक प्रभाव और मानवीय पीड़ा को पकड़ने का प्रयास करते हैं।
इस दृष्टि से पुस्तक को अपने समय के सामाजिक जीवन का एक काव्यात्मक दस्तावेज भी कहा जा सकता है।
स्थानीयता से वैश्विक मानवीयता की ओर
पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष इसका स्थानीय जुड़ाव है। कवि ने अपने क्षेत्र पीलीभीत की धरती, उसके तीर्थाटन और पर्यटन को अपनी रचनाओं में स्थान दिया है।
स्थानीय तीर्थस्थलों और पर्यटन स्थलों का वर्णन केवल भौगोलिक परिचय नहीं है। इसके पीछे अपनी मिट्टी के प्रति लगाव और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने की भावना दिखाई देती है।
साहित्य की शक्ति यही है कि वह स्थानीय अनुभव को सार्वभौमिक संवेदना में बदल देता है। पीलीभीत कवि के लिए केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि स्मृति, संस्कृति और पहचान की भूमि बनकर सामने आता है।
सर्वधर्म समभाव : विविधता में एकता का स्वर
‘कलियुग के भगवान’ का एक उल्लेखनीय गुण इसकी समन्वयकारी धार्मिक दृष्टि है।
कवि ने अपनी रचनाओं में किसी एक धर्म या संप्रदाय तक स्वयं को सीमित नहीं किया। होली के साथ ईद का उल्लेख, कैथोलिक चर्च का वर्णन, नानकमत्ता और सुंदर गुरुद्वारे का स्मरण—ये सभी प्रसंग कवि की सर्वधर्म समभाव की दृष्टि को व्यक्त करते हैं।
यह दृष्टिकोण भारतीय संस्कृति की उस मूल भावना से जुड़ता है जिसमें विविध आस्थाओं को एक व्यापक मानवीय धरातल पर देखने की परंपरा रही है।
कवि की धार्मिकता विभाजनकारी नहीं, बल्कि समावेशी और सांस्कृतिक दिखाई देती है।
धार्मिक चेतना और लोक आस्था
पुस्तक का आरंभ ‘मुकुट बिहारी लाल’ रचना से होता है। इसके पश्चात ‘शक्तियों का आवाहन’, ‘गोमती माता की आरती व चालीसा’, भगवान परशुराम जी, होली और ईद आदि से संबंधित रचनाएँ पुस्तक की धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना को विस्तार देती हैं।
गोमती माता की आरती और चालीसा जैसी रचनाएँ धार्मिक आस्था को लोकभाषिक और काव्यात्मक अभिव्यक्ति देती हैं। वहीं विभिन्न पर्वों और धार्मिक प्रतीकों को साथ लेकर चलना कवि के व्यापक सांस्कृतिक दृष्टिकोण को सामने लाता है।
राष्ट्रप्रेम : श्रद्धा और स्मृति का स्वर

पुस्तक में राष्ट्रप्रेम भी एक महत्त्वपूर्ण भावधारा के रूप में उपस्थित है। ‘वंदे मातरम्’ की महत्ता, शहीदों के प्रति श्रद्धा और राष्ट्रनायकों का स्मरण कवि की राष्ट्रीय चेतना को व्यक्त करता है।
कवि ने भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को भी स्मरण किया है। राष्ट्र के प्रति समर्पण करने वाले व्यक्तित्वों को काव्य में स्थान देना कवि की राष्ट्रीय स्मृति के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है।
यह राष्ट्रप्रेम केवल नारे के रूप में नहीं, बल्कि शहीदों की स्मृति, मातृभूमि के प्रति सम्मान और राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति आस्था के रूप में अभिव्यक्त होता है।
परिवार : निजी संसार का सार्वजनिक काव्य
पुस्तक में कवि ने अपने परिवार को भी रचनात्मक संसार का हिस्सा बनाया है। परिवार के सदस्यों का काव्य में उल्लेख तथा चित्रों के माध्यम से पारिवारिक एकता का प्रदर्शन पुस्तक को निजी आत्मीयता प्रदान करता है।
इससे पुस्तक केवल कवि की सामाजिक दृष्टि का दस्तावेज नहीं रह जाती, बल्कि उसके व्यक्तिगत जीवन और संबंधों की स्मृति-पुस्तिका भी बन जाती है।
साहित्यकार जब अपने निजी संसार को रचना में स्थान देता है तो वह निजी अनुभव को सामाजिक संवेदना में रूपांतरित करता है। ‘कलियुग के भगवान’ में यह प्रवृत्ति भी दिखाई देती है।
लोकप्रियता और जनसुलभता
पुस्तक की एक विशेष उपलब्धि उसका निःशुल्क वितरण है। कवि ने पुस्तक को केवल सीमित साहित्यिक पाठक वर्ग तक रखने के बजाय घर-घर पहुंचाने का प्रयास किया।
अधिकारियों और साहित्यकारों को पुस्तक भेंट करना, स्थानीय पुस्तकालयों में इसे निःशुल्क उपलब्ध कराना तथा पीलीभीत जिला कारागार के पुस्तकालय तक इसकी पहुंच—ये सभी तथ्य पुस्तक की जनसुलभता को रेखांकित करते हैं।
विशेष रूप से यह तथ्य उल्लेखनीय है कि जेल के पुस्तकालय में भी पुस्तक उपलब्ध है और वहां इसकी रचनाओं को पाठकों द्वारा पसंद किए जाने की बात सामने आती है। इससे यह संकेत मिलता है कि कवि का काव्य केवल साहित्यिक अभिरुचि रखने वाले पाठकों तक सीमित नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने में सफल रहा।
साहित्य को समाज तक ले जाने का प्रयास
‘कलियुग के भगवान’ की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह है कि कवि ने पुस्तक को केवल प्रकाशित करने तक सीमित नहीं रखा। विमोचन समारोह, निःशुल्क वितरण, पुस्तकालयों को प्रतियां देना और विभिन्न वर्गों के लोगों तक इसे पहुंचाना—ये सभी प्रयास साहित्य को समाज के बीच ले जाने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
आज जब पुस्तकें अक्सर सीमित पाठक-वर्ग तक सिमट जाती हैं, ऐसे में किसी रचनाकार का अपनी पुस्तक को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने का प्रयास साहित्य की सामाजिक भूमिका को पुनः स्थापित करता है।
भाषा और अभिव्यक्ति
सतीश मिश्र ‘अचूक’ की भाषा में सरलता, सहजता, लोकानुभव और व्यंग्यात्मक धार का मेल दिखाई देता है। उनकी पत्रकारिता-प्रवृत्ति भाषा को अनावश्यक जटिलता से बचाती है।
वे ऐसे विषय चुनते हैं जिन्हें सामान्य पाठक अपने दैनिक जीवन में देखता और अनुभव करता है। इसलिए उनकी रचनाओं का कथ्य पाठक के लिए अपरिचित नहीं लगता।
दोहा, कुंडलिया और अन्य छंदों में विचारों को बांधने का प्रयास उनकी छंद-संवेदना को सामने लाता है। साथ ही गीतों में भावुकता और धार्मिक रचनाओं में आस्था का स्वर उनकी रचनात्मक विविधता को पुष्ट करता है।
कवि की दृष्टि : आस्था, व्यंग्य और सामाजिक चेतना का संगम

‘कलियुग के भगवान’ को यदि कुछ प्रमुख शब्दों में समझना हो तो कहा जा सकता है कि यह आस्था, व्यंग्य, यथार्थ, राष्ट्रप्रेम, स्थानीयता और मानवीय सरोकारों का संगम है।
एक ओर कवि भगवान, देवी-देवताओं, तीर्थस्थलों और धार्मिक पर्वों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है; दूसरी ओर वही कवि धन, पद, प्रतिष्ठा और अहंकार को भगवान बना लेने वाले मनुष्य पर प्रश्न खड़े करता है।
एक ओर वह राष्ट्र और शहीदों के प्रति सम्मान व्यक्त करता है; दूसरी ओर व्यवस्था की विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य करता है।
एक ओर वह अपने परिवार और अपनी मिट्टी से जुड़ता है; दूसरी ओर समाज की व्यापक समस्याओं को अपनी कविता का विषय बनाता है।
यही द्वंद्व पुस्तक को जीवंत बनाता है।
निष्कर्ष : अपने समय का काव्य-दर्पण
‘कलियुग के भगवान’ को केवल 102 पृष्ठों का कविता-संग्रह मानना इसके साहित्यिक विस्तार को सीमित करना होगा। यह पुस्तक अपने समय के मनुष्य और समाज को देखने का कवि का एक विशिष्ट प्रयास है।
इसमें धन की बढ़ती सत्ता है, पद-प्रतिष्ठा का मोह है, आत्ममुग्धता पर प्रश्न है, व्यवस्था पर व्यंग्य है, पत्रकार की पीड़ा है, किसान की व्यथा है, धार्मिक आस्था है, सर्वधर्म समभाव है, राष्ट्रप्रेम है, स्थानीय संस्कृति है, परिवार की आत्मीयता है और सबसे बढ़कर मनुष्य को स्वयं से प्रश्न करने के लिए प्रेरित करने वाली दृष्टि है।
कवि सतीश मिश्र ‘अचूक’ ने इस पुस्तक के माध्यम से अपने समय को दर्ज करने का प्रयास किया है। उनकी कविता में साहित्यिक सौंदर्य के साथ सामाजिक सरोकार भी है और सामाजिक सरोकार के साथ लोक-संपर्क भी।
‘कलियुग के भगवान’ का वास्तविक महत्त्व इसी बात में निहित है कि यह पाठक को केवल कविता पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि अपने आसपास की दुनिया और अपने भीतर के मनुष्य को देखने के लिए भी प्रेरित करती है।
धन, पद, प्रतिष्ठा और अहंकार के इस युग में कवि का मूल प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है—मनुष्य ने भगवान को बदला है या भगवान के नाम पर अपनी इच्छाओं को ही भगवान बना लिया है?
इसी प्रश्न की प्रतिध्वनि ‘कलियुग के भगवान’ को एक विचारोत्तेजक और सामाजिक सरोकारों से जुड़ा काव्य-संग्रह बनाती है।
(एआई के डिजिटल दिमाग से समीक्षा)


